
“हाल-ए-दिल”
होता है ऐसा भी
मन करता है महसूस करने का संगीत को
पर शब्दो का मन में जाल इतना बना होता है
कि शब्दो के एक-दूसरे से वार्तालाप के आगे
संगीत के कितने भी ऊँचे स्वर हो
मन तक दिल की तारो के ज़रिए तेज न सही धीरे भी नहीं आ पा रहा है,
होता है ऐसा भी
दिमाग एक ऐसी किताब बनता जा रहा है,
खुद से ज़्यादा दूसरे के बारे में सोचा जा रहा है,
जिसमे अच्छाइयों से ज़्यादा बुराइयों पर ध्यान जा रहा है,
जानता हूँ है शाम खूबसूरत पर तो उसे ख़ुदको धोखा दे कर चार दीवारों में कही किसी जगह खो जा रहा हूँ,
होता है ऐसा भी
शायद हो ये एक सन्देश की ये दिल फिर से बैठता जा रहा है,
सहारा ले कर खड़ा होने की चाह के साथ कोशिश तो बहुत की पर फिर भी गिरता जा रहा है,
आँखे जैसे फूटने को होती है दर्द इतना ज़्यादा होता जा रहा है,
शब्द निकलते है अंदर से “सब कुछ छूटता जा रहा हाँथो से रेगिस्तान की रेत की तरह फिसलता जा रहा है तू इतना लाचार कब से हो गया कि ख़ुदको यूँ टूटता हुआ बिखरता क्यों देखे जा रहा है”?
#विजय सिंह यादव✍️








