सवेरा

सवेरा
इन खूबसूरत सुबहों से रिश्ता कोई जाना पहचाना कुछ पुराना सा लगता है,

पहले न हुआ करती थी इतनी खूबसूरत पर आजकल तो फिर से जैसे छेड़ा कोई गुज़ारा तराना लगता है,


आज़ाद पक्षियों की सुरीली आवाज़ और उनकी टोली बिखेरती दिखती है नीले गगन में सकारात्मकता और रंगोली,


हर पेड़ से कोई न कोई सुरीली आवाज़ आती है और ये एहसास कराती है कि जैसे यहाँ भी जीवन हो,

सुन्दर सुन्दर हल्की हल्की हवा के झोंके कानों में ठंडी ठंडी आवाज़ करते निकलते हैं मानों सुप्रभात बोल रहे हों,


और अब आसमान में हल्की हल्की लालीमा होने लगती है इस हल्की अंधेरी सुबह में इंसानो की भी ज़िन्दगी उजाले से जगमगाने लगती हैं,

पेड़ो को चीरती सूरज की किरण दिखती है,


ये जो छतों पर दौड़ते लोग दीखते हैं,

किसी पिंजरे में कैद जानवर से लगते हैं,


नई सुबह, नया सवेरा, महकेगा फूलो की खुशबू से घर सबका तेरा हो या मेरा।


#विजय सिंह यादव

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