
“सुबह”
ये सुबह हमेशा से इतनी चमत्कारी क्यों रहती हैं?
न जाने अकेली इतनी खुश कैसे रहती है?
कभी जल के तो कभी हवाओं के साथ बहती उड़ती फिरती रहती हैं,
हर रोज़ रात के अंधियारे को अलविदा करके ख़ुदको सुबह के उजियारे से ढकती फ़िरती हैं,
पर देखा है मेने अक्सर जब भी वो ऐसा कुछ करती है हमेशा चहकती हुई इधर उधर फ़िरती रहती हैं,
देखा है मेने अक्सर की तू इंसानो के पक्ष में अपने रंग ढंग बदलती रहती हैं,
रात के अंधेरे से चमगादड़ को भगा कर सुरीली पंछियों को खुदमे जगह देती रहती है,
छुप-छुप के कही गाया करती है कोयल अपना गाना तो कही चिड़िया चह चहाती फ़िरती हैं,
सुबह-सुबह के बहाने छत की दीवारों पर रखे मिटटी के बर्तनो में दाने को कबूतरो की निगाहें तकती रहती हैं,
तू हर सुबह नई-नई खुशियों के जो चमत्कार करती फ़िरती है,
शायद इसलिए अभी तक तू कुँवारी आवारा सी रहती फ़िरती हैं…
#विजय सिंह यादव