“हाल-ए-दिल”

“हाल-ए-दिल”

होता है ऐसा भी
मन करता है महसूस करने का संगीत को
पर शब्दो का मन में जाल इतना बना होता है
कि शब्दो के एक-दूसरे से वार्तालाप के आगे
संगीत के कितने भी ऊँचे स्वर हो
मन तक दिल की तारो के ज़रिए तेज न सही धीरे भी नहीं आ पा रहा है,

होता है ऐसा भी
दिमाग एक ऐसी किताब बनता जा रहा है,
खुद से ज़्यादा दूसरे के बारे में सोचा जा रहा है,
जिसमे अच्छाइयों से ज़्यादा बुराइयों पर ध्यान जा रहा है,
जानता हूँ है शाम खूबसूरत पर तो उसे ख़ुदको धोखा दे कर चार दीवारों में कही किसी जगह खो जा रहा हूँ,

होता है ऐसा भी
शायद हो ये एक सन्देश की ये दिल फिर से बैठता जा रहा है,
सहारा ले कर खड़ा होने की चाह के साथ कोशिश तो बहुत की पर फिर भी गिरता जा रहा है,
आँखे जैसे फूटने को होती है दर्द इतना ज़्यादा होता जा रहा है,
शब्द निकलते है अंदर से “सब कुछ छूटता जा रहा हाँथो से रेगिस्तान की रेत की तरह फिसलता जा रहा है तू इतना लाचार कब से हो गया कि ख़ुदको यूँ टूटता हुआ बिखरता क्यों देखे जा रहा है”?

#विजय सिंह यादव✍️

एक कुत्ते और इंसान के बीच वार्तालाप

“एक कुत्ते और इंसान के बीच वार्तालाप”

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
जो मै अच्छा हूँ तो मेरे साथ बुरा क्यों करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
जो अगर तुम हो अच्छे तो तुम सब एक-दूसरे के साथ खुश होने का दिखावा क्यों करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
तुम कही न कही मुझसे घृणा करते हो तभी
मुझको तुम पत्थरो से मार कर भागा करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
जो मै तुम्हे काट लूँ तो मुझे पागल बता के लाठी डंडे से प्रताड़ित किया करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
मैं भूलता नहीं जब तुम मेरे जैसे को फांसी भी लगाया करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
तुम ये सोचते नहीं हो की दम मेरा भी घुटता होगा बच्चा मेरा भी किसी गाड़ी के नीचे छुपकर मुझे ऐसे मरता देख डरता और रोता होगा,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
बोलते हो वफ़ादार बहुत हूँ मै तो क्यों तुम मुझे अकेला प्लास्टिक की एक बोतल के साथ खेलने पर मजबूर करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
तुम कहते हो मेरे बच्चे कितने प्यारे है शायद इसी लिए भगवन सात-सात को एक दिन में भूखा रख कर अपने पास बुलाते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
होली में गुब्बारों और दिवाली में पटाखों से मुझे पल पल मारा करते हो,

तुम मेरे साथ ऐसा क्यों करते हो?
मुझे पालते है प्यार से वो जिनकी औलाद नहीं होती है तभी तो खाना रोज खिलते है दिवाली हो या होली का त्यौहार शायद उनके ऐसे करने से ही ख़ुशी मिलती हो,

#विजय सिंह यादव✍️

खाना

“खाना”

खाना जब
“थाली” में होता है
तो पेट भरता है,
और वही खाना
जब “प्लेट” में
आ जाता है
तब जेब खाली
हो जाती है…

खाने का स्वाद
तो बस हाँथो से
खाना खाने से
आता है
चम्मच से
खाने में मन
भरता है…

खाना जब
गरीब को
मिलता है तो
वो खुश होकर
खा लेता है,
और अमीर
उसी खाने में
स्वाद ढूंढता है…

#विजय सिंह यादव

ये कोरोना क्या क्या दिन दिखायेगा

ये कोरोना क्या क्या दिन दिखायेगा,

किसको पता था रामायण इतना देखा जायेगा की वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाते हुए दुनिया में सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला धारावाहिक बन जायेगा,

किसी परिवार को शक भी नहीं था उनको फिर से रामायण के ज़रिये जोड़ा जाएगा,

सरकार ने करे बच्चों के सपने सच स्कूल को किया बंद तो सुनी बड़ो की भी बात “वर्क फ्रॉम होम” का आदेश लाये जिससे सबको घर पर ही रोका जायेगा,

सोचा नहीं था उसने जिसने कभी ज़िन्दगी में कुछ बनाया नहीं था खाने को की वो भी रसोई में बावर्ची बन जायेगा,

मिला करते थे जो चाय की टपरी पर रोज़ शाम को अब लॉक-डाउन में घर में कैद वीडियो कॉलिंग उनको मिलायेगा,

आया फ़रमान सरकार का हुए खुश मजदूर लगा तो सबको की बैठे बैठे उनको उनकी दिहाड़ी को दिया जायेगा,

सोचा किसी ने नहीं था अगर न मिली दिहाड़ी तो कैसे मजदूर का पेट पाला जायेगा सोचा नहीं था किसी ने की कैसे घर का किराया दिया जायेगा,

आंका सब ने मजदूर को कम सोचा ये कहाँ दिल्ली से यूपी बिहार बिना साधन के जा पायेगा,

हुआ न ऐसा कुछ फिर भी भनक नहीं लगी की ये मजदूर है नंघे पांव अपने घर पैदल ही चलता चला जायेगा,

किसने सोचा था कोरोना कभी इंसानो को भी कुत्ते की तरह मुह पर मास्क की एक बंदिश तो कभी मजदूरों को मीलों मील तप्ती सड़को पर चलवायेगा,

जानवर भी हुए होंगे खुश जब पता लगा होगा की अब उनको कैद करने वालो को खुद कैद में रखा जायेगा,

पर एक बात तो तय है जब जब कोरोना काल को याद किया जायेगा तब तब डॉक्टर, पुलिस, सफाई कर्मियों, और बाकि कोरोना योद्धाओं का नाम सबसे पहले लिए जायेगा,

ये इंसानो से बंदर जैसा नाच करवाएगा,
ये कोरोना है साहब अभी तो और रुलायेगा…

#विजय सिंह यादव

सोचा तो था

“सोचा तो था”

सोचा तो था
ज़िन्दगी में
चल रहा है
सब मेरे मुताबिक़
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
रचूँगा में भी इतिहास
आखिर यही तो
सब सोचा करते है…

सोचा तो था
पढ़ाई में अपना
नाम होगा
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
रहेंगे स्कूल के दोस्त
ज़िन्दगी भर साथ
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
की ज़िन्दगी
स्कूल के बाद
बदल जायेगी
आसान हो जायेगी
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
होगी लाइफ सेट
कॉलेज के बाद
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
बनूँगा में भी अमीर
होगा खुदका घर
आखिर यही तो
सब सोचा करते है…

सोचा तो था
चलेगा सब मेरी
सोच के हिसाब से
आखिर यही तो
सब सोचा करते है…

सोचा तो था
समझूँगा हर एक
समझ को इस
दुनिया की
आखिर यही तो
सब सोचा करते हैं…

सोचा तो था
के हो जायेगा सब ठीक
आखिर यही तो
सब सोचा करते है…

सोचा तो था
मेने भी बहुत कुछ
खुदके लिए
आखिर यही तो
सब सोचा करते है…

#विजय सिंह यादव

सुबह

“सुबह”

ये सुबह हमेशा से इतनी चमत्कारी क्यों रहती हैं?
न जाने अकेली इतनी खुश कैसे रहती है?

कभी जल के तो कभी हवाओं के साथ बहती उड़ती फिरती रहती हैं,

हर रोज़ रात के अंधियारे को अलविदा करके ख़ुदको सुबह के उजियारे से ढकती फ़िरती हैं,

पर देखा है मेने अक्सर जब भी वो ऐसा कुछ करती है हमेशा चहकती हुई इधर उधर फ़िरती रहती हैं,

देखा है मेने अक्सर की तू इंसानो के पक्ष में अपने रंग ढंग बदलती रहती हैं,

रात के अंधेरे से चमगादड़ को भगा कर सुरीली पंछियों को खुदमे जगह देती रहती है,

छुप-छुप के कही गाया करती है कोयल अपना गाना तो कही चिड़िया चह चहाती फ़िरती हैं,

सुबह-सुबह के बहाने छत की दीवारों पर रखे मिटटी के बर्तनो में दाने को कबूतरो की निगाहें तकती रहती हैं,

तू हर सुबह नई-नई खुशियों के जो चमत्कार करती फ़िरती है,

शायद इसलिए अभी तक तू कुँवारी आवारा सी रहती फ़िरती हैं…

#विजय सिंह यादव

एक चुटकुला

“एक चुटकुला”

कभी तुम होती हो ऑफ़लाइन तो कभी वो हो जाता हैं,
एक चुटकुला जो याद आया बात करते वक़्त तुमसे
उसको बताते-बताते सूरज पूर्व से उगता और पश्चिम से अस्त हो जाता है,

ये तो जानते है सब की सूरज कहाँ से उदय और होता कहाँ अस्त है,
मेने तो बताना चाहा तुम्हे की बस इतना वक़्त चुटकुला बताने में लग जाता हैं,

वो है जानता की पाला है लिखने का शोख़ तुमने हालातों की वजह से,
हर कोई यू ही कही कवि थोड़ी न बन जाता है,

हाँ बातें होती है अच्छी भी और बुरी भी बहुत तुमसे,
डर तो लगता है पर इन बातों में उसे मज़ा बहुत आता हैं,

इन्ही अच्छी, बुरी बातों में होती है ग़म की भी बातें कई,
पर जो तुमसे बोला जाता है वो हर किसी से बोला नहीं जाता हैं,
आखिर में इन अच्छी, बुरी और ग़म की बातों पर चुपके-चुपके धीरे से उसका एक चुटकुला आता है और चहरे पर खुशियाँ फैला जाता हैं…

#विजय सिंह यादव

मालूम नहीं

“मालूम नहीं”

मालूम नहीं
हो तुम सही हो या मैं
मालूम नहीं
हो तुम ग़लत या मैं
मालूम नहीं
हो तुम ग़म में या मैं
मालूम नहीं
हो तुम जशन में या मैं
मालूम नहीं
जीतोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
हारोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
हँसोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
रोओगे तुम या मैं
मालूम नहीं
खाओगे तुम या मैं
मालूम नहीं
भूखे रहोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
पढ़ोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
अनपढ़ तुम बनोगे या मैं
मालूम नहीं
मरोगे तुम या मैं
मालूम नहीं
जियोगे तुम या मैं
मालूम नहीं…

#विजय सिंह यादव

मजदूर का सड़क से सवाल

एक लाचार थका हारा मजदूर पूछता है सड़को से सवाल की जब मैने ;

तुम्हे इतनी मेहनत से बनाया,
तुम्हे अपने इन छाले भरे हाँथों से बनाया,
तुमसे अपने बच्चे की तरह प्यार जताया,
तुममें अपना खून पसीना तक लगाया,
खुद रोटी दो पल देरी से खायी,
पर तेरा ख्याल भरपूर रखा,
तुम्हे बचा हुआ ढाई घूट पानी तक पिलाया,

तब क्यों???

तब क्यों तुम इस गर्म तप्ती भट्टी में मुझे नीचे से झुलसा रहे हों?
तब क्यों तुम मेरे पाव पर छालों का एक जल बिछा देते हो?
तब क्यों तुम मुझे मेरे घर तक बिना दर्द दिए नहीं पहुँचाते हो?
तब क्यों तुम मेरा मृत शरीर अपने ऊपर रख रहे हो?
तब क्यों तुम मुझे ख़ुदको मेरे इन नंगे पाँवो से नापने नहीं दे रहे हो?
तब क्यों तुम मेरे सवालो का जवाब नहीं दे रहे हो?

क्या मेरा तुम पर इतना भी
हक़ नहीं रह गया है???

#विजय सिंह यादव

महावीर अभिमन्यु

“महावीर अभिमन्यु”

कृष्ण का शिष्य, भीष्म के पौत्र अर्जुन का हैं पुत्र हैं अभिमन्यु,

जिसने सुभद्रा के गर्भ में सीखा चक्रव्यूह को तोड़कर घुसना तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने किया जीवन का पहला युद्ध भीष्म से और काटे बाण भीष्म के तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने रोका रास्ता भीष्म का तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने छोड़ा दुर्योधन को न किया वध भीम का शिकार बता कर तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने किया युधिष्ठिर की चिंता को दूर तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने भेदा अकेले गुरु द्रोण के चक्रव्यूह को तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने केवल चक्रव्यूह में घुसने का रास्ता जाना पर फिर भी चक्रव्यूह में गया तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने अकेले चक्रव्यूह के अंदर मारे योद्धा कभी तीर से काटे कभी तलवार से तू को वीर अभिमन्यु,

चक्रव्यूह के मध्य में अडग खड़ा जो रहा तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने चक्रव्यूह में भेदा द्रोण, मद्र नरेश, कुल गुरु, कर्ण, अश्वथामा जैसे महारथियों की छाती को तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने किया लहुलुहान मामा शकुनी, दोनों ताऊ दुशासन और दुर्योधन को तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने न त्यागी युद्ध करने की अभिलाषा होने के बाद रथहीन कर्ण के निर्दयी बाण से तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने बोला हूँ में शिष्य वासुदेव श्री कृष्ण का मानूँगा न हार लडूँगा सभी महारथियों से अकेला तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने उठाया पहिया रथ का और युद्ध किया कौरव सेना से तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसका लगा लहु नंघी तलवारों पर जिसका किया क़त्ल सात-सात ने मिलकर तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने पुकारा अपने पिता को धरा पर पड़े हुए अधमरा बोला पूछना यहाँ की भूमी से कैसे लड़ा इन सभी कायर योद्धाओं से तू वो वीर अभिमन्यु,

जिसने मरते मरते बोला ये मेरा दुर्भाग्य है कि में तुम जैसे कायरों के हाँथो को वीर गति को प्राप्त हो रहा हूँ तू वो वीर अभिमन्यु,

तब देख कर ये दुखदायी मंज़र सभी गुरुओं की आँखे भर आती है,
चहरे से नहीं दिखाते पर आत्मा रो जाती हैं।

#विजय सिंह यादव