चंदा से कुछ सवाल…

#चंदा से कुछ सवाल...

क्या अपनी सुंदरता को इन बादलो के बीच से बिखेरना ज़रूरी हैं क्या?

क्या अपने जिस्म पर दाग जैसे दिखने वाली रेखाओं को दिखाना ज़रूरी है क्या?

क्या अपनी खूबसूरत रौशनी को इन बादलो की बनी जटाओं से गंगा के जल की तरह गिराना ज़रूरी है क्या?

क्या अपने आप को बचपन की पहेली “एक काली प्लेट में रसगुल्ला” की तरह दिखाना ज़रूरी हैं क्या?

क्या अपने आप को पूरा दिखने के लिए पूरे तीस दिन का इंतज़ार कराना जरूरी हैं क्या?

क्या अपने आप को इतना जगमगा कर हर जगह उजाला करना ज़रूरी हैं क्या?

क्या अब सबको तेरी सुन्दर तस्वीर लगा कर कुछ अच्छा कुछ बुरा लिखना ज़रूरी हैं क्या?

क्या तेरे इस आनंदमय नज़ारे में किसी खास को याद करना ज़रूरी हैं क्या?

क्या मेरे मन में तेरी बस एक तस्वीर देख कर इतने सवालो का आना ज़रूरी हैं क्या?

#विजय सिंह यादव

“मजदूर”

“मजदूर”

हे भइया ई मजदूर कौन होत हैं?

मजदूर वो होत हे जिसकी ये ऊंची औकात वाला ज़माना कौनों इज्ज़त नाही करता हैं,

मजदूर वो होत हे जो अपने दम पर बड़ी बड़ी ईमारत खड़ी कर देत हैं,

मजदूर वो होत हे जिसका पेट्रोल उसकी खैनी, बीड़ी और थोड़ा कत्था और ज़्यादा चूना वाला पान होता  हैं,

मजदूर वो होत हे जो इन इज्ज़तदार लोगो के रहने के लिये आलीशान बंगला बनाते है,

मजदूर वो होत हे जो हांथो में दर्जनों छालो के साथ काम  करता रहता हैं,

मजदूर वो होत हे जो दुसरो के लिए बड़ी बड़ी ईमारत बनाता हैं पर खुद टीन टप्पर की झौपड़ी में सो जाते हैं,

मजदूर वो होत हे जो इन इज्ज़तदार लोगो के लिए सड़क, पुल, आदि का निर्माण करते हैं,

मजदूर वो होत हे जो उन नालियों की सफ़ाई करते हैं जिसमे साँस लेना तक मुश्किल होता है,

मजदूर वो होत हे जो उन बड़े घर की बड़ी औकात वाली महिला को तरह नहीं कहता “भइया इयू कितनी बदबू आ रही हैं,

मजदूर वो होत हे जिसने ताज महल को बनाया और अपने हांथो की बली देकर उसको विश्वप्रसिद्ध कराया हैं,

मजदूर वो होत हे जिसने मालिको के लिए लाखों का माल बनाया है और उसके खुदके हाँथ में पाँच सौ रूपया आया हैं,

मजदूर वो होत हे जो खेतो में काम करके पूरी दुनिया को खिलाता हैं वो अलग बात है कि खुदके परिवार के लिए दो रोटी को तरस जाता हैं,

मजदूर देश की रीढ़ माना जाता है इसकी इज्जत करो यही सबका जीवन चलता हैं।

#विजय सिंह यादव

“इरफ़ान ख़ान”

#इरफ़ान ख़ान

“इरफ़ान ख़ान” ये नहीं है बस इक नाम,
था ये आज के दशक का एक महानायक का नाम,

हुआ जिनका जन्म जनवरी के सातवें दिन में,
वर्ष 1967, जयपुर जैसे सुन्दर शहर में,

छोड़ा जयपुर और आये दिल्ली सीखा अभिनय कैसे करना,
हुई नई शुरुआत वर्ष 1988 से ही किया शुरू फिल्मो में अभिनय करना,

सुना है कि बनना चाहते थे क्रिकेटर पर घर वालो की वजह से नहीं बन पाये,
रहे हो कही भी पर मकर सक्रांति पर अपने जयपुर से ही पतंग उड़ाने आये,

हो तुम प्रिय कलाकारों में सबसे ऊपर मेरे और सबके,
डाल नहीं सकता पैर उस जूते में जिसमे थे पैर कभी तुम्हारे खुल के,

हुआ बहुत ही तगड़ा घाटा जो छोड़ गए तुम बांह हमारी,
पड़ रहे हैं कम बोलने को शब्द कम तारीफ में तुम्हारी,

शामिल हुए बड़े बड़े कलाकारों में मिला जब पदम् श्री वर्ष 2011 में,
लो अब “अम्मा मुझे लेने आ गयी” ये अंतिम शब्द कहकर छोड़ गए वर्ष 2020 में।

धन्यवाद सर आपकी कलाकारी ने न सिर्फ हिन्दुस्तान बल्कि पूरी दुनिया में अपना डंका बजवाया हैं…
आपका बहुत बहुत धन्यवाद
आप जहाँ भी रहे खुश रहें।

#विजय सिंह यादव

कभी कभी मुस्कुराना कितना मुश्किल पड़ता है…

#कभी कभी मुस्कुराना कितना मुश्किल पड़ता हैं,
पर करे तो क्या करे मुस्कुराना तो पड़ता है…

जब एक बिटिया अपनी पढाई पूरी नहीं कर पाती शादी के चलते,
दुखी तो बहुत होती है पर करे तो क्या करे माँ बाप के सामने मुस्कुराना तो पड़ता है,

माँ बाप अपना वर्तमान निछावर कर देते है बच्चों का भविष्य और ज़िन्दगी बनाने में,
दुखी तो बहुत होते है पर करे तो क्या करे बच्चों के सामने मुस्कुराना तो पड़ता हैं,

ये ज़रूरी नहीं होता है आप जब किसी जोकर को हँसाते देखते है तो वो खुश ही होता है,
दुखी तो बहुत होता है पर करे तो क्या करे जनता के सामने मुस्कुराना तो पड़ता हैं,

रोजगार की तलाश में निकला यूवा जब घर बिना नोकरी के लौटता है तो,
दुखी तो बहुत होता है पर करे तो क्या करे घरवालों के सामने मुस्कुराना तो पड़ता हैं,

वर्ल्ड कप को आखरी गेंद पर हार जाने पर कप्तान और टीम,
दुखी तो बहुत होती है पर करे तो क्या करे जनता के सामने मुस्कुराना तो पड़ता हैं,

बाहर से जितना भी मुस्कुरा लो पर अंदर से दिल उतना ही दुखता हैं,
पर भले ही मुस्कुराना कितना मुश्किल क्यों न हो मुस्कुराना तो पड़ता है…

#विजय सिंह यादव

वो पल बहुत याद आते हैं

#वो पल बहुत याद आते हैं…

वो पल बहुत याद आते हैं,
जब हम किसी अपने को घर छोड़ जाते हैं,

ये ज़रूरी नहीं की अपने से मतलब किसी सगे से ही हो,
कई अपने पराये भी बन जाते हैं,

अब मुझे ही देखो मेरे परिवार तो मेरा अपना हें ही,
पर न जाने मेरे दोस्त कब मेरे अपने बन जाते हैं,

यारो दोस्तों के साथ बिताया हर वो पल जो ज़िन्दगी भर याद आते हैं,
चाह कर भी कभी न दिलो दिमाग से जा पाते हैं,

इस नई यूवा पीढ़ी को न जाने कोनसी लात लगी हैं सिगरेट और दारू की,
शर्ते रखने पर भी इसे न अब छोड़ पते हैं,

ज़माने को ये लगता है कि ये तो सिगरेट और दारू के नशे में चूर हो जाते हैं,
पर ज़माने की इस सोच को ये अपने जूते तले दबाते हैं,

भविष्य को लेकर उठे मन में जो सवाल या मानसिक तनाव होते हैं,
न जाने कैसे किसी अपने के साथ बैठकर उसे बताने की बजाये कैसे अपने दिल में दफ़न कर जाते हैं,

कुछ अपने तो कहते हैं मेने लिखा हुआ है तेरा भविष्य,
ये बात बताकर वो बस इतना बताना चाहते है कि तुम्हे इतना चाहते है इतना चाहते है कि हनुमान जी की तरह सीना चीर के दिखाये की कितना चाहते है,

चलो कविता से शुरू हुई इस रेल गाड़ी की इस फ़िल्मी डायलॉग से वापस कविता पर लाते हैं,

वो पल बहुत याद आते है,
जब हम किसी अपने को घर छोड़ जाते हैं।

#विजय सिंह यादव

बस यूँ ही कुछ किया तुम करो

#बस यूँ ही कुछ किया तुम करो

कुछ लिखा तुम करो,
कुछ पढ़ा तुम करो,
न मरा तुम करो,
न डरा तुम करो,
बस बढ़ा तुम करो,
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो…

आँखों में न गड़ा तुम करो,
न किसी से सड़ा तुम करो,
खुद की सोच को बड़ा तुम करो,
दुश्मन के आगे अड़ा तुम करो,
क्रोध से अपने डरा तुम करो,
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो…

खुद को किसी लायक खड़ा तुम करो,
ज़िन्दगी में कुछ बड़ा तुम करो,
ख़ुदको पैसों से बड़ा तुम करो,
फल को न मरो कर्म तुम करो,
तानो को कभी झेला तुम करो,
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो…

किसी की भावना से खेल न तुम करो,
नशे का त्याग तुम तो करो,
लोगो की मदद तुम तो करो,
बेज़ुबान को प्यार तुम तो करो,
दिमाग को आराम दिया तुम तो करो,
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो…

भेद-भाव को परे तुम तो करो,
हिन्दू-मुस्लिम तुम न करो,
काला-गोरा न करा तुम करो,
स्वर्ग-नर्क में न फसा तुम करो,
गरीब-अमीर में न बंटा तुम करो,
कभी अकेले नई राह पर चला तुम करो,
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो…
बस यूँ ही कुछ किया तुम करो।

#विजय सिंह यादव

ये था मेरा जन्मदिन

#ये था मेरा जन्मदिन

लो बज गए सुबह के बारह, पलट गया एक और दिन कैलेंडर में, हुई तारिख बाइस अप्रेल की, हुआ में भी बाइस साल का, इस साल में जो हैं बदनसीब दो हज़ार बीस। शुरू हुई आनी बधाइयां जन्मदिन की व्हात्सप्प पर तो किसी ने दी फेसबुक पर, किसी की बधाइयां टेक्स्ट मैसज द्वारा आयी और न पढ़ने की वजह से मिले ताने की पढ़ा नहीं मैसेज मेरा दिया नहीं प्रतिउत्तर मुझे कोई। जन्मदिन की बधाइयां देने की शुरुआत करने में पांडेय जी सबसे आगे तो रहे कहाँ रहे पीछे मोटे भालू हमारे, खेला बाक़ी दिलो के टुकड़ों ने भी ये स्टेटस पर मेरी तस्वीर लगाने खेल लिखा सबने अच्छा अच्छा उनको लगता हूँ में एक सीधा बच्चा। कुछ की थी बधाइयां दिल को छू जाने वाली और कुछ की थी बस दो शब्दों की जैसे औपचारिकता का खेल निभाने वाली।एक भाई ने दी बधाइयां मुझे कहकर झालमूड़ी का दीवाना, तो एक ने दिखाई तस्वीर उपहार स्वरूप की किसका है वो दीवाना, एक भाई ने दिखाई मुझसे मिलने की भावना, पर कोरोना कहकर मार डाली उसकी भावना। शायद जाग रहा हूँ इंतज़ार में की आयेगी बधाई मेरे यार की, पर लगता है खत्म हुआ है नाता हुई नई शुरुआत मेरे यार की। चलो बजे सुबह के दो अब थोड़ा सो लेता हूँ, आयेगा ये बधाइयों का सैलाब सुबह भी थोड़ा ख़ुदको सपनो में खो लेता हूँ। लो हुई सुबह खिला खिला सा मौसम जिसमे खोया में दिखता हूँ। लो आने लगी बधाइयां उनकी जो सो रहे थे रात में, ऑन किया डाटा इंटरनेट की चहचहाने लगी चिड़िया मेरी फ़ोन की, मिली बधाइयां सभी दोस्त की या रूठे हुए मित्र की, आयी मेरे संकट मोचन की बधाई हुई बातें काफ़ी संगीत की, दी किसी ने बधाई गाना गा कर तो किसी ने सुंदर लिख कर। दी कुछ ऐसे लोगो ने भी बधाई जिनके आते नहीं है कभी संदेश मुझे। लगा अच्छा की कमसे कम कर तो लिए जन्मदिन के बहाने याद मुझे। अब रहेगा इंतज़ार शाम का देखो क्या होता है? खाने और खेलने को क्या मिलता हैं, वेसे दिन तो हैं ये बहुत खूबसूरत पृथ्वी दिवस के रूप में मनाया जाता है, मिले दोस्त भाई सब बिल्डिंग के, करी मस्ती लॉक डाउन वाली जम के, खिंची तस्वीरे अच्छी अच्छी, मौसम था खूबसूरत सही में सच्ची, आया कॉल यादव जी और प्रिय जनों का, करी मस्ती खूब कॉल पर ही ना था और कोई तरीका, अब होने लगा है अंधेरा लगता है रात होने वाली है, पर एक बात है जब आता है जन्मदिन तो ये दिन तुमको राजा बनाया जाता हैं, सब आते है बात करते हैं मिलते है जुलते हैं और जन्मदिन खत्म होते है अंजान बना कर चले जाते हैं अगले जन्मदिन तक। वेसे देखा जाये तो रात को जिनसे भी बात हुई बस पार्टी की फरियाद हुई, कोंन कैसे देगा, कहाँ देगा पार्टी इसी पर बात लगभग सारी रात हुई, अब हुआ समाप्ति की घोषणा जन्मदिन का काफी थकावट भरा ये दिन रहा और इसी के साथ अब रात हुई।

आप सब की बधाइयां मुझे अच्छी लगी सबका तहे दिल से शुक्रिया।

#विजय सिंह यादव

झालमूड़ी

“झालमुड़ी”

डरता हूँ मैं तेरी एक नज़र मेरी और उठ जाने से,
या तो ये मुझे घायल करेंगी या कत्लेआम करेगी,

तू गलत है ये जान कर भी तुझे कुछ कहना नहीं चाहती,
तुझे ये प्यार लगता है पर वो तुझसे लड़ना नहीं चाहती,

सबकी मदद करना तुझे अच्छा लगता है,
पर घुस्से में फूली नाक में तू मेरा बाबू मेरा बच्चा लगता हैं,

माना तेरे घुस्से के आगे किसी की नहीं चलती,
पर हम भी तो ढीट हैं हमारे आगे प्यार के सिवा किसी के बाप की नहीं चलती,

खाने का तेरा ये शोख़ लोगो से तुझे मोटी कहलवाता हैं,
पर तू भी क्या करे तेरा मन इसके बिना चल भी कहाँ पता हैं,

पता नहीं कैसे ये बदलाव आ रहा है तुझमे,
पहले जो घुस्सा था अब कही खो जा रहा है तुझमे,

हाँ जानता हूँ की कितना कुछ करती हो तुम परिवार चलाने को,
ना जाने क्यों चले आते हैं लोग तुझपे अधिकार जमाने को,

चल तुझे देख कर ये गाना करता हूँ अदा,
के रूठना मनाना ये प्यार की अदा, हैं प्यार की अदा।

#विजय सिंह यादव

अकड़

#अकड़

किसी को पैसों की अकड़,
जिसके दम पर वो किसी को भी खरीदने का रुतबा रखते हैं,

किसी किसान को अपनी किसानी की अकड़,
जिसके दम पर केवल वो ही लाखो परिवारों का पेट पालने की अकड़ रखते हैं,

किसी को अपनी दोस्ती की अकड़,
जिसके दम पर वो ज़रूरत पड़ने पर जान देने को भी तैयार रहते है,

किसी को समय की अकड़,
जिसके दम पर वो किसको अपना समय दे और किसको नहीं इसकी अकड़ रखते हैं,

किसी को प्राथमिकता की अकड़,
जिसके दम वो किसको अपनी प्राथमिकता दे और किसको न दे इसकी अकड़ रखते है,

किसी को अपने घमंड की अकड़,
जिसके दम पर वो घमंडी से घमंडी का घमंड तोड़ने की अकड़ रखते हैं,

किसी को अपने व्यवहार की अकड़,
जिसके दम पर वो सारी दुनिया को खुश रखने वाले ग़ुरूर की अकड़ रखते हैं,

किसी को अपने शरीर की अकड़,
जिसके दम पर वो किसी से भी लड़ने की अकड़ रखते है,

किसी को अपनी कलम की अकड़,
जिसके दम पर वो सच को लिखने का दम रखते हैं,

#विजय सिंह यादव

ये कुदरत भी करती है देखो कितने मोल भाव…

ये कुदरत भी करती है देखो कितने मोल भाव,
सुबह की जादूई रौशनी में भी करदी घनगोर घटाओ की इतनी सुन्दर छाव,
जिस तरह लडे थे पेशवा बाजी राव,
ना सीखा था करना करना इज्ज़त का मोल भाव,
बहा दी नादिया खून की ऐसा था बरताव,
करा था उन्होंने भी लाशों से मोल भाव,
गरीबो की मदद करना था उनका स्वभाव,
ये कुदरत भी करती है देखो कितने मोल भाव,
सुबह की जादूई रौशनी में भी करदी घनगोर घटाओ की इतनी सुन्दर छाव।

#विजय सिंह यादव